केंद्र सरकार ने किसानों, खांडसारी उद्योग और चीनी मिलों के एक वर्ग के तीखे विरोध के बाद शुगरकेन कंट्रोल ऑर्डर-2026 के मसौदा संशोधनों को वापस ले लिया है। सरकार ने कहा है कि राज्यों और अन्य हितधारकों से मिले सुझावों और आपत्तियों को देखते हुए ड्राफ्ट पर दोबारा विचार करना जरूरी है, इसलिए इसे फिलहाल वापस लिया जा रहा है।
पिछले महीने जारी किए गए इन संशोधनों पर 20 मई तक सार्वजनिक टिप्पणियां मांगी गई थीं। लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों, खांडसारी और गुड़ उद्योग से जुड़े लोगों ने इसके कई प्रावधानों का विरोध किया था।
क्या था सबसे बड़ा विवाद?
ड्राफ्ट में प्रस्ताव था कि गुड़ और खांडसारी इकाइयों के लिए लाइसेंस लेना अनिवार्य होगा और उन्हें किसानों को सरकार द्वारा तय फेयर एंड रेम्यूनरेटिव प्राइस (FRP) का भुगतान करना होगा।
किसान संगठनों का कहना था कि इससे हजारों छोटे और असंगठित गुड़-खांडसारी इकाइयों पर अतिरिक्त नियंत्रण और कानूनी दबाव बढ़ जाएगा। उनका आरोप था कि कुछ प्रावधान दंडात्मक प्रकृति के हैं, जिससे किसानों और छोटे उद्योगों दोनों को नुकसान हो सकता है।
यूपी के गन्ना बेल्ट में बड़ा असर
भारत में हर साल पैदा होने वाले लगभग 43.5 करोड़ टन गन्ने में से करीब 31 प्रतिशत गन्ना गुड़, खांडसारी और जैगरी उद्योग में इस्तेमाल होता है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ, मुजफ्फरनगर, बागपत, सहारनपुर, बिजनौर, अमरोहा और बरेली जैसे जिलों में हजारों 'कोल्हू क्रशर' आधारित इकाइयां संचालित होती हैं। अनुमान है कि प्रमुख गन्ना उत्पादक जिलों में 2,000 से 3,000 तक ऐसी इकाइयां मौजूद हैं। इनमें से अधिकांश छोटे उद्यम हैं, जिन्हें किसान स्वयं या स्थानीय कारोबारी चलाते हैं।
किसानों की क्या आपत्तियां थीं?
क्रशर की परिभाषा पर विवाद: भारतीय किसान यूनियन (अराजनैतिक) ने कहा कि पारंपरिक कोल्हू और आधुनिक क्रशरों को अलग-अलग श्रेणी में रखने के बजाय उनकी क्षमता के आधार पर वर्गीकरण होना चाहिए।
शक्कर की श्रेणी पर आपत्ति: किसान संगठनों का तर्क था कि 'शक्कर' वास्तव में पिसा हुआ गुड़ है, इसलिए उसे खांडसारी चीनी की श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए।
गन्ने की कीमत तय करने के फार्मूले पर सवाल: किसानों ने कहा कि FRP केवल चीनी रिकवरी के आधार पर तय की जाती है, जबकि चीनी मिलें अब एथेनॉल, कम्प्रेस्ड बायोगैस (CBG), शीरा (Molasses), बगास से बिजली और प्रेसमड जैसे उत्पादों से भी बड़ी कमाई करती हैं। इसलिए इन आय स्रोतों को भी गन्ने की कीमत तय करने में शामिल किया जाना चाहिए।
FRP भुगतान का मुद्दा: किसान संगठनों का कहना था कि खांडसारी उद्योग अक्सर FRP से अधिक भुगतान करता है, लेकिन भुगतान बाजार और उत्पाद की रिकवरी पर निर्भर करता है। ऐसे में सरकारी मूल्य को अनिवार्य बनाने से छोटे उद्योगों पर दबाव बढ़ सकता है।
किसानों ने राष्ट्रीय लोकदल (RLD) प्रमुख और केंद्रीय मंत्री जयंत चौधरी से भी मुलाकात कर ड्राफ्ट पर अपनी आपत्तियां रखी थीं। किसानों का कहना था कि प्रस्तावित बदलावों से किसानों और छोटे क्रशर संचालकों दोनों में असंतोष बढ़ रहा है।
सहकारी चीनी मिलों ने सुझाव दिया था कि पूरे देश में गुजरात मॉडल लागू किया जाए, जिसमें गन्ने का भुगतान तीन किस्तों में चीनी रिकवरी के आधार पर किया जाता है। साथ ही उन्होंने किसानों के हित में 14 दिन से अधिक देरी होने पर 15 प्रतिशत ब्याज की व्यवस्था बनाए रखने की मांग की थी।
वहीं, कुछ निजी चीनी मिलों का मानना था कि प्रस्तावित संशोधनों से उन पर निगरानी और नियामकीय दबाव बढ़ सकता है, जिससे उनका संचालन प्रभावित होगा।



